दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को अपने जनवरी 2025 के उस आदेश को वापस लेने से इंकार कर दिया, जिसमें उसने दिल्ली सरकार को फरवरी 2020 के दंगा पीड़ितों को 21 करोड़ रुपए का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया था।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार मुआवज़े की सिफारिश उत्तर पूर्व दिल्ली दंगा दावा कमेटी ने की थी, जिसे आम आदमी पार्टी सरकार ने अप्रैल 2020 में अधिसूचित किया था।
दिल्ली सरकार ने उच्च न्यायालय के आदेश का सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय के आधार पर किया था कि जानी या माली नुकसान की भरपाई हिंसा करने वालों या कराने वालों से की जानी चाहिए।
सरकार ने सोमवार को अदालत को बताया कि उन्होंने अभी तक हिंसा के लिए आरोपियों से पैसे वसूलने की कोई मैकेनिज्म नहीं बनाई है।
दंगों में 53 लोग मारे गए थे, जिनमें अधिकतर मुस्लिम थे और 200 से अधिक लोग घायल हुए थे।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देने पर अदालत ने दिल्ली सरकार से मौखिक रूप से पूछा, “सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के निर्णयों के अनुसार नुकसान के लिए जिम्मेवार लोगों से रकम आपको वसूलनी है। क्या आपने रकम वसूली है? वह लोग (पीड़ित) हिंसा करने वालों के पास जाकर रकम नहीं वसूल सकते। क्या जा सकते हैं? आपको कोई प्रणाली बनानी होगी उनसे रकम वसूलने की। क्या आपके पास कोई प्रणाली है?”
वकील ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ मुकदमे चल ही रहे हैं और कोई प्रणाली अब तक नहीं बनाई गई है।
15 जनवरी 2025 को पीड़ितों के अनुरोध पर अदालत ने सरकार को मुआवज़ा वितरित करने का निर्देश दिया था। तत्कालीन आप सरकार ने अनुरोध का विरोध नहीं किया था।
मौजूदा सरकार, जो पिछले साल फरवरी 2025 में बनी, ने दावा किया कि उनके वकील के स्थान पर पेश हुए प्रॉक्सी वकील ने “अनापत्ति” “अनजाने में” और बिना संबद्ध विभाग के निर्देशों के बिना दी थी।
सितंबर 2025 में दिल्ली सरकार ने उच्च न्यायालय में अर्जी देकर जनवरी में दिया आदेश वापस लेने का अनुरोध किया था। एकल न्यायाधीश ने उस आवेदन को मई में खारिज किया था जिसे सरकार ने डिवीजन बेंच में चुनौती दी थी।
(जनचौक डेस्क)